रेशम की खेती कैसे करें | Silk Farming in Hindi | रेशम के कितने प्रकार होते हैं

दरअसल खेती से जुड़े ऐसे कई कार्य है, जिसे शुरू कर अच्छी आमदनी की जा सकती है | खेतीबाड़ी से ही जुड़ा एक ऐसा काम है, रेशम की खेती करना अर्थात रेशम कीट पालकर रेशम का उत्पादन करना | रेशम की खेती कैसे करें ? इसकी जानकारी देने के साथ ही आपको यहाँ Silk Farming in Hindi और रेशम के कितने प्रकार होते हैं, इसके बारें में पूरी जानकारी प्रदान की जा रही है |

रेशम की खेती

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रेशम की खेती (Silk Farming) से सम्बंधित जानकारी

वर्तमान समय में खेती एक उद्योग बनकर उभर रही है | खेती करनें के मतलब सिर्फ गेहूं-चावल का उत्पादन करना ही नही है बल्कि पशुपालनमत्स्य पालन, मिल्क प्रोसेसिंग प्लांट (Milk Processing Plant), डेयरी उद्योग सहित कृषित कार्यों से सम्बंधित ऐसे कई काम-धंधे हैं जिनसे आज किसान भाई अच्छी-खासी आमदनी कर रहे हैं | खेती से होनें वाली आमदनी को देखते हुए अधिकांश लोग नौकरी-पेशा छोड़कर कृषि कार्यों की तरफ रुख कर रहे है |

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रेशम कृषि या रेशम की खेती क्या है (Silk Farming in Hindi)

कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक, रेशम उद्योग की वृद्धि को देखते हुए इसमें रोजगार की संभावनाएं काफी अधिक है | चूँकि यह फैशन उद्योग के काफी करीब है, जिससे इस बात की संभावनाएं काफी बढ़ जाती है कि इसकी डिमांड में कमी नहीं आएगी। पिछले कुछ वर्षों में भारत का रेशम उद्योग में इतनी अधिक बढ़ोत्तरी हुई है, कि जापान और पूर्व सोवियत संघ के देशों को इस मामले में पीछे छोड़ दिया है, जो कभी रेशम उत्पादन में सबसे आगे हुआ करते थे |

हमारा देश रेशम का बड़ा उपभोक्ता होने के साथ ही मलबरी, टसर, ओक टसर, एरि और मूंगा रेशम की इन 5 प्रकार की किस्मों का प्रोडक्शन करने वाला अकेला देश है। भारत में मूंगा रेशम के उत्पादनएकमात्र नकदी फसल है, जी एक माह अर्थात 30 दिनों के अन्दर प्रतिफल देती है | दरअसल रेशम का विक्रय मूल्य बहुत अधिक होता है और इसके उत्पादन की मात्रा काफी कम होती है।

रेशम की खेती करने को अंग्रेजी भाषा में सिल्क फार्मिंग (Silk Farming) कहते है | रेशम की खेती आम फसलों की तरह नही बल्कि इनसे भिन्न होती है | रेशम की खेती करने के लिए रेशम के कीटों को पालन करना होता है, इसके साथ ही इन कीटों के लिए भोजन की व्यवस्था भी करनी पड़ती है | हालाँकि इन कीटों को पालने के लिए अधिक जगह की आवश्यकता नही होती है परन्तु इनके भोजन की व्यवस्था के लिए आपको एक खेत की जरुरत अवश्य पड़ती है |

रेशम के कीटों का पालन करनें के लिए शहतूत एक महत्वपूर्ण कारक है | शहतूत के बिना आप रेशम कीट पालने की सोंच भी नही सकते | दरअसल शहतूत एक बहुवर्षीय वृक्ष है, एक बार इसके पौधे को एक बार लगाने पर यह लगभग आगामी 15 वर्षो तकउच्च गुणवत्ता वाली शहतूत की पत्तियाँरेशम कीट के भोजन के लिए प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होती है। हालाँकि पहली बार शहतूत के पौधौ का वृक्षारोपण करते समय तकनीकी मापदण्डों का पालन करना अत्यंत आवश्यक होता है क्योंकि कोया की उत्पादन लागत में लगभग 50% धनराशि शहतूत की पत्तियों के उत्पादन में ही खर्च हो जाता है | इसके लिए यह आवश्यक है कि शहतूत की पत्तियों का उत्पादन अधिक से अधिक हो, जिससे इस उद्योग से अधिक से अधिक लाभ प्राप्त किया जा सके |

रेशम की खेती कैसे करे (Silk Cultivation)

रेशम की खेती अर्थात सिल्क फार्मिंग करने के लिए शुरूआती तौर पर आप ½ या 1 एकड़ खेत ले सकते है|दरअसल कीटों के लिए सबसे महत्वपूर्ण चीज उनका भोजन है और रेशम के कीट शहतूत की पत्तियां खाकर ही जीवित रहते है, और रेशन का निर्माण करते है | हालाँकि रेशम की खेती के लिए करने के लिए इसका प्रशिक्षण लेना अत्यंत आवश्यक है | इससे सम्बंधित जानकारी इस प्रकार है:-

शहतूत के पौधे का रोपण एवं उनका रखरखाव (Planting and Maintenance of Mulberry Plants)

शहतूत के पौधे लगाने के लिए भूमि का चयन करने के पश्चात पौधे लगानें के लिए क्यारियों को तैयार करना होगा |क्यारियों में 6-6 इंच के डिस्टेंस पर लम्बाई में लाईन बना लें। शहतूत के पौधे की कटिंग का 2/3 भाग तीन इंच की दूरी पर लाईनों मे गहराई में रोपित कर दें | इसके बाद कटिंग के चारो तरफ की मिट्टी को अच्छी तरह से दबा दे, ताकि हवा से कटिंग के सूखने की संभावना न हो | इसके पश्चात आपको गोबर की भुरभुरी खाद की एक पतली पर्त क्यारी में फैलाकर तुरंत सिंचाई कर दें | पहले महीनें में यदि क्यारी की ऊपरी पर्त सूखने लगाती है, तो आप उसकी सिंचाई कर दें, ताकि उसमें नमी बनी रहे | 

पौधौ के समुचित विकास के लिए लगभग 100 किग्रा० यूरियापयुक्त है। आपको 15-20 दिनों के अन्तराल में इसका प्रयोग पत्तियों को बचाते करना चाहिए | इसके तुरंत बाद भूमि की सिंचाई कर दें और समय-समय पर पौधालय का निरीक्षण कर यह देखना चाहिए कि पौधों की वृद्धि हो रही है | दीमक की रोकथाम के लिए एल्ड्रीन का छिड़काव करे | 6 माह बाद जब कटिंग से पौधे तैयार हो जाये तो उन्हें ट्रान्सप्लान्ट करना चाहिए। पौधौ को ट्रान्सप्लान्ट करते समय इस बात का विशेष ध्यान रखे कि पौधों की जड़ों को कोई नुकसान न पहुंचे। 

शहतूतके पौधौ का रोपड़ और उनकी दूरी (Mulberry Seedlings Plantation and Their Distance)

मुख्यतः झाड़ीनुमा पौधौ के रोपण में 3X3 या 3X2 इंच की दूरी पर वृक्षारोपण करना चाहिये | इस तरह से लगभग 1 एकड़ भूमि में लगभग 5 हजार पौधे लगाये जा सकते है |  शहतूत के पौधे लगानें के बाद उनके विकास में लगभग 1 वर्ष का समय लगता है | समुचित मात्रा में खाद/ उर्वरक का प्रयोग कर आप तीसरे वर्ष 1 एकड़ क्षेत्र से लगभग 8 से 10 हजार किग्रा शहतूत पत्ती का उत्पादन प्रतिवर्ष होने लगेगा ।इस तरह से आप एक साल में 800 से 1000डीएफएल्स कीटों का पालन किया जा सकता है, जिससे आपको लगभग 300 किग्रा कोया उत्पादन होगा। हालाँकि सामान्यत: 100 डीएफएल्स रेशम के कीटों के पालन हेतु 700 से 800 किग्रा शहतूत के पत्तियों की जरुरतहोती है।

शहतूत गैप फिलिंग (Mulberry Gap Filling)

शहतूत के पौधौ को लगानें अर्थात वृक्षारोपण के लगभग 1 माह पश्चात क्यारियों में देखे कि जो पौध सूख गये है उनकी जगह दूसरे नए पौधे लगायें, इसके इसे गैप फिलिंग कहते हे। मुख्यतः गैप फिलिंग का कार्य वृक्षारोपण के लगभग 1 से डेढ़ महीने के अन्दर पूरा कर लिया जाना चाहिए | अन्यथा बड़े पौधों के बीच छोटे पौधौ का विकास सही ढंग से नही हो पाता है | प्रति पेड़ पौध घटने से पत्ती का उत्पादन एवं तदनुसार कोया उत्पादन घटता है। फलस्वरूप आय भी प्रभावित होती है।

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शहतूतके पौधों में खाद और उर्वरक का प्रयोग कब करना चाहिए (When Should Manure and Fertilizer Be Used in Mulberry Plants)

खाद और उर्वरक का प्रयोग पौधौ को लगानें के लगभग 2 से 3 महीने का बाद 50 किग्रा नाइट्रोजन का प्रयोग एक एकड़ के हिसाब से किया जाना चाहिए। उदहारण के लिए यदि आपने जुलाई और अगस्त में पौधे लगाये है | इसके पश्चात सितम्बर और अक्टूबर के बीच आपने गैपफिलिग़ की है | इसके पश्चात मार्च या अप्रैल में आपको खाद और उर्वरक का उपयोग करना चाहिए | पौधे लगाने के ठीक 2 महीने के बाद हल्की निराई-गुड़ाई करवानी चाहिए | इसके बाद प्रत्येक छंटाई (Pruning) के के बाद गुड़ाई एवम निराई अवश्य की जानी चाहिए।

शहतूत के पौधौ की सिंचाई (Mulberry PlantIrrigation)

मानसून काल में लगाये गये पौधौ में प्राकृतिक वर्षा के कारण शरद काल में लगाये गये पौधौ की अपेक्षा लागत कम आती है। फिर भी वर्षा के सीजन मे यदि 15 से 20 दिनों के बीच बारिश नही होती है, तो पौधौ की सिंचाई करना अत्यंत आवश्यक है। आपको पौधौ की सिंचाई की व्यवस्था मई महीने के बीच ही कर लेनी चाहिए। इस समय में पंद्रह से बीस दिनों के अन्दर पर खेत की मिट्टी के अनुसार सिंचाई आवश्यक है।

शहतूतके पौधौ की कटाई-छंटाई (Mulberry Plant Harvesting and Pruning)

मुख्य रूप से पौधे लगानें के बाद इनकी कटाई-छंटाई का कार्य एक वर्ष में 2 बार किया जाता है | जून या जुलाई मेंजमीन के सतह से 6 इंच की ऊंचाई पर और एक बार दिसंबर के महीनें में जमीन के सतह से 3 फीट की ऊँचाई परकटाई-छंटाई की जाती है | कुल मिलाकर शहतूत पौधों की कटाई-छंटाई का कम इस प्रकार किया जाता है, कि कीटों को पालने के समय शहतूत पत्तियाँ उनके लिए पौष्टिक एवं प्रचुर मात्रा मेंउपलब्ध हो सकें।दिसंबर के महीने में शहतूत की झाड़ियों3 फीट की उँचाई सेकाट दिया जाता है और पेड़ की मुख्य शाखा से निकालने वाली पतली शाखाओंकटाई-छंटाई कर दी जाती है | इसके बाद गुड़ाई-निराई करते हूए रासायनिक खादों का उपयोग करना चाहिए | हालाँकि आपको इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि उर्वरक का प्रयोग और कीटों को पालने के लिए पत्ती तोड़ने के समय के बीच में लगभग 20 से 25 दिन का अंतर होना चाहिए |

इसी तरह से वर्षा के शुरूआती सीजन में शहतूत की झाड़ियों को जमीन की सतह से लगभग 6 इंच से 9 इंच की ऊंचाई पर काट लेना चाहिए | इसके पश्चात उनकी गुड़ाई करने के साथ ही खाद का प्रयोगकरे | हालाँकि कटाई-छंटाई करते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि शहतूत की टहनियों को किसी प्रकार की क्षति न पहुंचे और उनकी छाल भी न उखड़ने पाए | 

रेशम कीट पालन के इक्विपमेंट (Sericulture Equipment)

विद्युत स्प्रेयर, कीट पालन का स्टैंड, कीट पालन ट्रे, फोम पैड, मोम पुता हुआ पैराफिन कागज, नायलॉन की जाली, शहतूत के पत्ते रखने के लिए टोकरी, चटाई बैग, बांस के माउंटेजया नेट्राइक |

रेशम के कीट का इन्क्यूबेशन और ब्रशिंग (Incubation and Brushing of Silkworm)

अंडों को एक ट्रे पर रखे गए एक पैराफिन कागज पर फैला दें और एक अन्य कागज से अंडों को ढककर रख दें। इस बात का ध्यान रखे कि कमरे का टेम्प्रेचर 25 से 26 डिग्री सेल्सियस और रिलेटिव ह्यूमिडिटी 80 प्रतिशत बनाये रखे | जब आपको नीला सिरा दिखाई देने लगे तो अंडों को एक टिशू पेपर में लपेट दें इसके पश्चात अंडों को काले रंग से रंगे हुए बॉक्स में एक से दो दिनों के लिए रख दें और अगले दिन अंडों को हल्की धूप या छाया में रखें।

रेशम के कीटों को माउंटेज पर चढ़ाना और कटाई (Plating and Harvesting Silk Insects on Mount ages)

कीड़ों कोमाउंटेज पर चढ़ाने के लिए पूर्ण रूप से पके हुए कीटों को उठाये और प्लास्टिक के बंधन या बांस माउंटेजों जैसे उपयुक्त माउंटेज मेंप्रति वर्ग फुट क्षेत्र में 40-45 कीटों को चढ़ाएं। रोगों से ग्रस्त और मरे हुए कीड़ो को अलग निकाल दें | इस बार का ध्यान रखे कि तापमान27 से 28 डिग्री और 60% से लेकर 70% का आरएच बना रहे | यदि नमी अधिक है, तो इसे कम करनें के लिए रोशनदान का प्रयोग करे परन्तु तीव्र रोशनी सेबचाव करें। चढ़ाने के 5 वें दिन कोकूनों को समेटें और उसमें से कमजोर, दागदार और अनियमित आकार के कोकूनों अर्थात रेशम के कोयों को निकाल दें।

रेशम कीट पालन में स्वच्छता (Sanitation in Sericulture)

कीट पालन घर में जाने से पहले आपको कीटाणुनाशक रसायन से हाथों को धुल लेना चाहिए और आपको पालन में शामिल लोगों के अलावा अन्य बाहरी व्यक्ति को प्रवेश नही देना चाहिए |  प्रत्येक 5 से 6 दिनों के अन्तराल में पालन घर के आस-पास की जगहों पर ब्लीचिंग पाउडर छिड़काव करे । रोगों से ग्रस्त और मरे हुए कीड़ो को एकत्र कर उन्हें मिट्टी में दफनाएंअथवा उन्हें जलाकर नष्ट कर दें | इसके अलावा जब लार्वा केंचुली से बाहर आते हैं तब लार्वा बिस्तर पर कीटाणुनाशक रसायन का प्रयोग करना करते रहे।

रेशम के कितने प्रकार होते हैं (Silk Types)

मुख्य रूप से रेशम 4 प्रकार के होते है,

मलबरी रेशम(Mulburry Silk)

इस प्रकार का रेशम एक एक सर्व-सामान्य रेशम का प्रकार है | मलबरी रेशम के उत्पादन के मामले में भारत का विश्व में दूसरा स्थान है | मलबरी रेशमबॉम्बिक्स मोरी (Bombix mori) नामक कीटों से तैयार किया जाता है | इस प्रकार के रेशम में नेचुरल शाईनिंग के साथ-साथ चिकनापन व कोमलता होती है | जो खासकर रेशमी कपड़ो और साड़ियों की विशेषता होती है। इन कीटों को पालनें के लिए मलबरी अर्थात शहतूत की खेती की जाती है, जिससे एक बड़ी मात्रा में पत्तियाँ उपलब्ध होती हैं।

टसर रेशम (Tussar Silk)

टसर रेशम (Wild silk) को साधारण भाषा में कोसा और वन्या सिल्क भी कहते हैं । इस प्रकार के रेशम का उत्पादन मुख्य रूप से बंगाल, छत्तीसगढ़,बिहार और झारखंड में किया जाता है |  इस प्रकार के रेशम बुननें वालों के लिए सबसे अधिक प्रिय होता है तथा यह जीनस एंथेरिया नामक कीट से प्राप्त होता है | इस प्रकार के कीट वनों के पौधों तथा वृक्षों की पत्तियाँ खाते हैं | 

मूंगा रेशम (Moonga Silk)

इस प्रकार के रेशम मार्केट में सबसे महंगा मिलता है | मुख्य रूप से यह उत्तरपूर्व में पाया जाता हैं | इस प्रकार के रेशम का रंग हरा और पीला होता है | इस प्रकार के रेशम का उल्लेख रामायण और अनेक प्राचीन ग्रंथो एवं महाकाव्यों में किया गया है। यह रेशम मुख्य रूप से एन्थेरे आसामेंसिस (Antheraea assamensis) नमक कीटों से प्राप्त होता है और यह कीट असम के सुगंधी सोम एवं सुआलू की पत्तियाँ खाते हैं।

एरी या अहिंसा रेशम (Eri or Nonviolence Silk)

इस प्रकार के रेशम की प्राप्ति सामिया रिसिनी तथा फिलोसामिया रिसिन प्रजाति के कीटों से प्राप्त होता है | इस रेशम का सीधा सम्बन्ध अरंडी के पौधे से है और इस प्रजाति के कीट भोजन के रूप में अरंडी के पत्ते खाते हैं | यह कीट असमान एवं अनियमित कोष बुनते हैं। इस प्रकार के रेशम के कोकूनों को कीटों के उड़नें के बाद प्रयोग में लाया जाता है | जिसके कारण इस प्रकार के रेशम को प्राकृतिक अहिंसा रेशम कहा जाता है। इस प्रकार का रेशम से बने वस्त्रों का उपयोग शीत ऋतु में सबसे अधिक किया जाता है |

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