सिंघाड़ा की खेती कैसे करें, [Singhara ki kheti] | सिंघाड़े की खेती करने का तरीका

जिस वजह से परंपरागत तौर पर खेती करने वाले किसान भी सिघाड़े की खेती की और रूख कर रहे है | कम समय में अधिक मुनाफा देने वाली सिंघाड़े की खेती को मछुआरो-कहारों के अलावा सामान्य किसान भी अपना रहे है | लेकिन सिघाड़े की खेती कैसे की जाती है, इसकी जानकारी सभी लोगो को नहीं होती है |  इसलिए यहाँ पर आपको सिंघाड़ा की खेती कैसे करें ( Singhara ki kheti kaise kare ) तथा सिंघाड़े की खेती करने का तरीका बताया जा रहा है |

सिंघाड़ा की खेती कैसे करें

सिंघाड़ा की खेती [Singhara ki kheti] से सम्बंधित जानकारी

सिंघाड़े की खेती कच्चे फल के रूप में की जाती है | भारत में सिंघाड़े को महत्वपूर्ण जलीय फसलों में विशेष स्थान प्राप्त है | इसे जलीय अखरोट की फसल भी कहते है, जिसे विशेषकर उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में पानी में उगाया जाता है | झीलों, तालाबों और जिस जगह पर 3 फ़ीट तक पानी हो वहां इसे आसानी से ऊगा सकते है | पोषक तत्व से भरपूर और क्षारीय जल में इसकी खेती आसानी से कर सकते है | सिंघाड़ा फल पोषक तत्व से भरपूर होता है, तथा इससे बना आटा व्रत-त्योहारों में खूब उपयोग किया जाता है | देश के कई राज्यों जैसे :- उड़ीसा, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश और पश्चिम बंगाल राज्य की सरकारे सिंघाड़ा उत्पादन के लिए नर्सरी और सब्सिडी की भी सुविधा प्रदान कर रही है |

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सिंघाड़े की खेती के लिए उपयुक्त जलवायु (Chestnut Cultivation Suitable Climate and Water)

सिंघाड़ा उष्णकटिबन्धीय जलवायु वाली फसल है, जिसे बिहार, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश राज्य में खूब उगाया जाता है | सिघाड़े की खेती 2 से 3 फ़ीट पानी के भराव वाले स्थिर जल में कही भी कर सकते है | चूंकि सिंघाड़ा जलीय पौधा है, इसलिए इसकी खेती में मिट्टी की जरूरत नहीं होती है | किन्तु जहा जलाशयों की मिट्टी अधिक भुरभुरी होती है, वहां सिंघाड़े की पैदावार काफी बेहतर होती है | इसके अलावा मिट्टी में ह्युमस भी अच्छी मात्रा में हो | क्षारीय पीएच मान वाले जल में उपज अच्छी मिलती है |

सिंघाड़ा खाने के फायदे (Water Chestnut Benefits)

  • अस्थमा के मरीजों को सिंघाडे का सेवन करना चाहिए |
  • बवासीर की समस्या से भी सिंघाड़ा निजात दिलाता है |
  • अगर आपके शरीर के किसी हिस्से में दर्द या सूजन है, तो उस स्थान पर सिंघाड़े का लेप लगाने से फायदा मिलता है | इसके अलावा यह फटी एड़ियों को भी ठीक करता है |
  • इसमें भरपूर कैल्शियम होता है, जिस वजह से यह हड्डी और दांत को मजबूत बनाता है, तथा आँखों को भी फायदा पहुँचाता है |
  • सिंघाड़े का सेवन पीरियड्स की समस्याओ को भी दूर करता है |

सिंघाड़ा की उन्नत किस्में (Water Chestnut Improved Varieties)

  • लाल छिल्का सिंघाड़ा :- इसमें VRWC1 और VRWC 2 सबसे उन्नत प्रजाति है | इस क़िस्म को काफी कम उगाया जाता है, क्योकि इसका फल कुछ दिन में ही काला पड़ने लगता है, जिस वजह से बाज़ारी भाव भी अच्छे नहीं मिल पाते है |
  • हरे छिल्का सिंघाड़ा :- इस क़िस्म को व्यापारिक तौर पर उगाया जाता है, जिसमे VRWC 3 सबसे उन्नत जाति है | हरा छिल्का सिंघाड़ा काफी समय तक ताज़ा बना रहता है, तथा बाजार में इसकी बिक्री भी काफी अधिक रहती है |

इसके अलावा कुछ किस्में है, जिसमे लाल गठुआ, हरीरा गठुआ, लाल चिकनी गुलरी और कटीला शामिल है | यह किस्में 120 से 130 दिन में तुड़ाई के लिए तैयार हो जाती है| देर से उपज देने वाली किस्मो में गुलरा हरीरा, गपाचा और करिया हरीरा शामिल है, जो 150 से 160 दिन में तोड़ी जाती है |

सिंघाड़े की फसल में आप कांटे वाली किस्मो की तुलना में बिना कांटे वाली किस्मो को अधिक उगाए, क्योकि यह अधिक उत्पादन दे देती है, तथा गोटियों का आकार भी अन्य किस्मो की तुलना में बड़ा होता है, जिससे तुड़ाई में भी आसानी होती है |

सिंघाड़े के पौध की तैयारी (Chestnut Seedlings Preparation of Water)

सिंघाड़े की फसल के लिए नर्सरी को जनवरी से फ़रवरी के महीने में तैयार करना होता है | अगर आप पौध को बीज के माध्यम से तैयार कर रहे है, तो बीजो को जनवरी से फ़रवरी के महीने में लगा दे, तथा जब पौधा रोपाई के काबिल हो जाए तो इसमें से एक – एक मीटर लंबी बेल को तोड़कर उसे मई से जून के महीने में तालाब में रोपाई कर दे | यदि आप सिंघाड़े के बीजो को लेकर परेशान है, तो आप इसके बीजो को अपने राज्य के उद्यान विभाग से संपर्क कर खरीद सकते है | इसके अलावा अगर आप सिंघाड़े को पहले से ही ऊगा रहे है, तो अगली फसल की रोपाई के लिए दूसरी तुड़ाई से प्राप्त स्वस्थ पके फलो को बीज के रूप में इस्तेमाल कर सकते है| इसके लिए आप एक बात जरूर ध्यान में रखे की फल को जनवरी के महीने तक भिगोकर रखे, तथा अंकुरण से पूर्व फ़रवरी के पहले सप्ताह में इन्हे तालाब में डाल दे | इसके बाद जब मार्च के महीने में फलो से बेल निकलना आरम्भ कर दे तो जून से जुलाई के महीने में बेलो की रोपाई कर दे |

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सिंघाड़ा रोपण का समय (Water Chestnut Planting Time)

सिंघाड़े की फसल पानी में की जाती है | इसलिए इसके पौधों का रोपण मानसून के महीने में करना काफी बेहतर होता है | मानसून के महीने में वर्षा के साथ ही सिंघाड़े का रोपण शुरू कर दे | इस दौरान जून-जुलाई का महीना होता है | आमतौर पर सिंघाड़े के बीजो को छोटे तालाबों, पोखरों में बोया जाता है | इसके अलावा खेत में गड्डे को तैयार कर उसमे पानी भरकर भी सिंघाड़ा बीजो को लगाया जा सकता है |

सिंघाड़े की सिंचाई और उर्वरक प्रबंधन (Watershed Irrigation and Fertilizer Management)

सिंघाड़े की फसल अधिक पानी वाली होती है | जिस वजह से इसे कम खाद की जरूरत होती है | इसमें आपको भिन्न खाद देने की जरूरत पड़ती है | पौध रोपण से पूर्व 8 से 10 टन पुरानी गोबर की खाद प्रति हेक्टेयर के हिसाब से दे | इसके अलावा प्रति हेक्टेयर में 60 KG फास्फोरस, 40 KG नाइट्रोजन और 40 KG पोटाश का इस्तेमाल किया जाता है | इस खाद का इस्तेमाल रोपाई से पहले एक तिहाई मात्रा में किया जाता है, और बची हुई नाइट्रोजन की मात्रा को एक माह के अंतराल में डालते है |

सिंघाड़े की फसल में रोगो की रोकथाम (Water Chestnut Crop Prevention of Diseases)

सिंघाड़े की खेती में अधिकतर माहू, सिंघाड़ा भृंग, घुन, नीला भृंग और लाल खजूरा नमक कीट देखने को मिलता है | जो फसल को 25-40% तक नष्ट कर देते है | इसके अतिरिक्त लोहिया और दहिया रोग भी खतरनाक हटवा है, जिससे बचाव के लिए समय पर कीटनाशक का इस्तेमाल करना चाहिए |

सिंघाड़ा की खेती से लाभ (Water Chestnut Cultivation Benefits)

सिंघाड़े की फसल 18 महीने की होती है | जिसमे एक हेक्टेयर के तालाब से आप 80 से 100 क्विंटल तक हरे फल की पैदावार प्राप्त कर सकते है, तथा 18 से 20 क्विंटल सूखी गोटी मिल जाती है | सिंघाड़े की प्रति हेक्टेयर की फसल में 50 हज़ार की लागत आती है| इस तरह से अगर सभी खर्चो को निकाल दिया जाए तो 1 लाख रूपए का शुद्ध मुनाफा लिया जा सकता है |

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