मसूर की खेती कैसे करे | Lentil Farming in Hindi | मसूर बोने का सही समय | मसूर की किस्में

मसूर का इस्तेमाल दाल के रूप में खाने के अलावा नमकीन और मिठाइयों को बनाने के लिए भी करते है| यह एक दलहनी फसल है, जिस वजह से इसकी जड़े गांठ वाली होती है, इन जड़ो में सूक्ष्म जीवाणु उपस्थित होते है, जो मिट्टी में नाइट्रोजन की मात्रा को बढ़ाते है, जिस वजह से भूमि की उपजाऊ शक्ति भी बढ़ती हैं| किसान भाई मसूर की खेती व्यापारिक तौर पर कर अधिक मुनाफा भी कमाते है| यदि आप भी मसूर की खेती करने का मन बना रहे है, तो इस लेख में आपको मसूर की खेती कैसे करे (Lentil Farming in Hindi) तथा मसूर बोने का सही समय और मसूर की किस्में के बारे में जानकारी दी जा रही है|

मसूर की खेती

मसूर की खेती (Lentil Farming in Hindi)

मसूर की खेती दलहनी फसल के लिए की जाती है| सभी दालों में मसूर का एक महत्वपूर्ण स्थान है, इसे लाल दाल भी कहते है| भारत में मसूर की खेती रबी की फसल के साथ की जाती है| असिंचित जगहों पर भी इसकी खेती आसानी से की जा सकती है| क्योकि इसके पौधे सूखा, नमी और कम तापमान के प्रति सहनशील है| मसूर के दानो में पोषक तत्व की मात्रा अधिक होती है| इसके 100 GM दानो में 25 GM प्रोटीन, 68 MG कैल्शियम, 0.51 मिली ग्राम थाइमिन, 7 मिली ग्राम आयरन, 4.8 मिलीग्राम नियासिन, 0.21 मिलीग्राम राइबोफ्लोविन, 1.3 GM वसा, 3.2 GM रेशा और 60.8 GM कार्बोहाइड्रेट की मात्रा पायी जाती है, जो मानव शरीर के लिए काफी लाभकारी है|

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भारत में मसूर की खेती (Lentil Farming in India)

पूरे विश्व में भारत को मसूर की खेती के लिए दूसरा स्थान प्राप्त है| भारत के मध्य प्रदेश राज्य में तकरीबन 5.85 लाख हेक्टेयर के क्षेत्र में मसूर की बुवाई की जाती है, जो की 39.56 प्रतिशत है| जिस वजह से यह राज्य सबसे अधिक मसूर उत्पादन वाला क्षेत्र है| इसके अलावा उत्तर प्रदेश में 34.36 फीसदी व् बिहार में 12.40 प्रतिशत तक उत्पादन होता है| महाराष्ट्र में प्रति हेक्टेयर 410 KG मसूर का उत्पादन किया जाता है| जिस वजह से यह व्यावसायिक स्तर पर अधिक मुनाफा देने वाली फसल है|

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मसूर की खेती के लिए भूमि और जलवायु का चयन (Lentils Cultivation Land and Climate)

मसूर की खेती के लिए नम संरक्षण वाली भारी दोमट मिट्टी की जरूरत होती है| क्षारीय व् हल्की भूमि में मसूर की खेती बिल्कुल न करे, क्योकि ऐसी मिट्टी में अधिक सिंचाई की जरूरत होती है| इसके अलावा खेत में उचित जल निकासी की व्यवस्था होनी चाहिए, तथा भूमि का P.H. मान 6.5 के 7 के मध्य हो| मसूर की खेती रबी की फसल के साथ की जाती है| इस दौरान ठंडी का मौसम होता है, ठंड जलवायु में पौध विकास अच्छे से होता है|

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मसूर की उन्नत किस्में (Lentils Improved Varieties)

उन्नत क़िस्मउत्पादन समयउत्पादन
नरेन्द्र मसूर-1 (एनएफएल-92)120 से 130 दिनप्रति हेक्टेयर 15-20 क्विंटल का उत्पादन
पूसा – 1110 से 110 दिन  प्रति हेक्टेयर 18 से 20 क्विंटल उत्पादन
पन्त एल – 406150 दिन  प्रति हेक्टेयर 30-32 क्विंटल का उत्पादन
टाइप – 36130 – 140 दिनप्रति हेक्टेयर 20 से 22 क्विंटल का उत्पादन
बी. 77115 – 120 दिन  प्रति हेक्टेयर 18 – 20 क्विंटल का उत्पादन
एल. 9-12135 – 140 दिनप्रति हेक्टेयर 18 – 20 क्विंटल का उत्पादन
जे. एल. एस. – 1120 दिनप्रति हेक्टेयर 20 – 22 क्विंटल का उत्पादन
जे. एल. एस. – 2100 दिनप्रति हेक्टेयर 20 – 22 क्विंटल का उत्पादन
नूरी (आईपीएल-81)110 से 120 दिन  प्रति हेक्टेयर 12 – 15 क्विंटल उत्पादन
मलिका (के -75)120 – 125 दिन  प्रति हेक्टेयर 12 से 15 क्विंटल का उत्पादन
सीहोर 74-3120-125 दिन  प्रति हेक्टेयर 10-15 क्विंटल का उत्पादन
सपना135-140 दिनप्रति हेक्टेयर 21 क्विंटल की पैदावार
पन्त एल – 234130-150 दिन  प्रति हेक्टेयर 15-20 क्विंटल की पैदावार
बीआर – 25125-130 दिन  प्रति हेक्टेयर 15-20 क्विंटल की पैदावार
पन्त एल – 639130-140 दिनप्रति हेक्टेयर 18-20 क्विंटल का उत्पादन
जे. एल. – 3100 से 110 दिनप्रति हेक्टेयर 12 – 15 क्विंटल का उत्पादन

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मसूर के खेत की तैयारी (Lentil Field Preparation)

मसूर की फसल उगाने से पहले खेत को ठीक तरह से तैयार कर लेना चाहिए| इसके लिए सबसे पहले खेती की सफाई कर उसकी ठीक तरह से गहरी जुताई करवा दे| इसके बाद खेत को ऐसे ही खुला छोड़ दे| कुछ समय के पश्चात् खेत में पानी लगाकर सूखने के लिए छोड़ दिया जाता है| इसके बाद रोटावेटर लगाकर खेत की दो से तीन तिरछी जुताई कर दी जाती है| तिरछी जुताई से खेत की मिट्टी भुरभुरी हो जाती है| इसके बाद पाटा लगाकर खेत को समतल कर दिया जाता है| समतल खेत में ही बीजो की रोपाई की जाती है|

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मसूर के खेत में खाद व उवर्रक की मात्रा (Lentil Field Quantity of Manure and Fertilizer)

मसूर की अच्छी पैदावार प्राप्त करने के लिए उचित मात्रा में खाद देना भी जरूरी होता है| इसके लिए रासायनिक उवर्रक के तौर पर 40 KG सल्फर, 20 KG नाइट्रोजन, 20 KG सल्फर और 20 KG पोटाश की मात्रा का छिड़काव प्रति हेक्टेयर के हिसाब से सिंचित अवस्था में बीज रोपाई के समय करना होता हैं| इसके अलावा असिंचित जगहों पर फास्फोरस 30 KG, 15 KG नाइट्रोजन, सल्फर 10 KG व् पोटाश की 10 KG की मात्रा को प्रति हेक्टेयर के खेत में बुवाई के समय दे| इसके अलावा यदि भूमि में जिंक सल्फेट की कमी पायी जाती है, तो प्रति हेक्टेयर के खेत में 25 KG जिंक सल्फेट का छिड़काव अन्य उवर्रको के साथ करे|

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मसूर के बीज एवं बुवाई का तरीका (Lentil Seeds Sowing Method)

मसूर के बीज की मात्रा की गयी बुवाई के समय पर निर्भर करती हैं| यदि आप उन्नत किस्मो की बुवाई समय पर करते है, तो आपको प्रति हेक्टेयर के हिसाब से 30 से 35 KG बीज चाहिए होते है, तथा देर से की गयी बुवाई के लिए प्रति हेक्टेयर के खेत में 50 से 60 KG बीज लगते है| इन बीजो को खेत में लगाने से पहले थाइरम या बाविस्टिन की उचित मात्रा से उपचारित कर ले| इसके बाद स्फुर घोलक जीवाणु पीएसबी कल्चर 10 GM और राइजोबियम कल्चर 5 GM की मात्रा को प्रति 1 KG बीज की दर से उपचारित किया जाता है| इन उपचारित बीजो को छायादार जगह पर ठीक तरह से सुखाकर उनकी बुवाई की जाती है|

बीज बुवाई के लिए शाम का समय सबसे अच्छा होता है| इन बीजो को खेत में दो तरीके से लगाया जाता है, पहला केरा पोरा या विधि से ड्रिल विधि का इस्तेमाल किया जाता है| केरा पोरा विधि में खेत में पोरा चोंगा लगाकर कतार बना दी जाती है| इन कतारों में ही बीजो को लगाया जाता है| ड्रिल विधि में खेत में 30 CM की दूरी पर पंक्ति तैयार की जाती है| पछेती फसल उगाने के लिए पंक्तियों को 20 से 25 CM की दूरी पर बनाया जाता है| इसके बीजो को ड्रिल की सहायता से भूमि में 3 से 4 CM गहराई में लगाना होता है|

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मसूर के पौधों की सिंचाई (Lentil Plants Irrigation)

मसूर के पौधों में सूखा सहने की शक्ति होती है| इसलिए इन्हे अधिक सिंचाई की जरूरत नहीं होती है| सिंचित जगह पर की गयी फसल के लिए 1 से 2 सिंचाई ही करनी होती है| इसकी पहली सिंचाई शाखा निकलने के पश्चात् बीज रोपाई के 40 से 45 दिन बाद की जाती है, तथा दूसरी सिंचाई फलियों में दाना आने के दौरान बुवाई से तक़रीबन 70 से 75 दिन बाद की जाती है| इस दौरान खेत में पानी का विशेष ध्यान रखे, कि पानी खेत में एकत्रित न हो सके| सिंचाई के लिए स्प्रिंकल विधि का इस्तेमाल करे| इसके अलावा धारिया बना कर भी सिंचाई कर सकते है| इसके पौधों को अधिक पानी बिल्कुल न दे, तथा खेत में जल निकासी अवश्य होनी चाहिए|

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मसूर के पौधों में खरपतवार नियंत्रण (Lentil Plants Weed Control)

मसूर के पौधों को खरपतवार से बचाना बहुत जरूरी होता है| यदि समय रहते खरपतवार पर नियंत्रण नहीं किया जाता है, तो पैदावार अधिक प्रभावित होती है| खरपतवार नियंत्रण के लिये खुरपी का इस्तेमाल करते है, हाथ से खरपतवार को निकालने पर खुलजी की समस्या हो सकती है| इसकी पहली गुड़ाई 45 से 60 दिन बाद की जाती है, तथा बाद खेत में खरपतवार दिखाई देने पर गुड़ाई करनी होती है| इसके अलावा आप पेन्डीमेथलीन 30 ई0सी0 की उचित मात्रा का छिड़काव बीज रोपाई के तुरंत बाद करे|

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मसूर के पौधों में लगने वाले रोग व उपचार (Lentil Plants Diseases and Treatment)

  • कालर राट या पद गलन:- इस किस्म का रोग मसूर के पौधों पर आरम्भ में ही देखने को मिल जाता है| इस रोग से प्रभावित पौधा जड़ के पास से सड़ने लगता है, और सड़ी हुई जगह पर फफूंद बनने लगती है|
  • जड़ सडन:- इस तरह का रोग मसूर के पौधों पर देरी से देखने को मिलता है| जड़ सड़न रोग से प्रभावित पौधे की जड़े काली पड़कर सड़ जाती है, तथा पौधा सूखने लगता है, और पत्ते पीले पड़ जाते है| इस तरह के पौधों को उखाड़ने पर पौधा जड़ के पास से ही टूट जाता है, तथा जड़ भूमि में ही दबी रह जाती है|
  • इस रोग से बचाव के लिए खेत की गहरी जुताई कर ही बीज की रोपाई करे| इसके अलावा खेत में पकी हुई गोबर की खाद डालें| इसके अतिरिक्त बीज रोपाई से पहले उन्हें थाइरम 2 GM + कार्वेन्डाजिम की 1 GM या 2 GM कार्बोक्सिन की उचित मात्रा से उपचारित कर बीजो को खेत में लगाए|
  • गेरूई रोग:- इस तरह का रोग जनवरी के माह में मसूर के पौधों पर आक्रमण करता है| यह रोग पौधों की पत्तियों पर आक्रमण करता है, जिससे पत्ती और तनो पर भूरे और गुलाबी रंग के धब्बे दिखाई देने लगते है, जो समय के साथ काले पड़ जाते है| इस रोग से अधिक प्रभावित होने पर सम्पूर्ण पौधा नष्ट हो जाता है|

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मसूर के फसल की कटाई और पैदावार (Lentil Harvest and Profit)

मसूर के पौधे बीज रोपाई के 110 से 140 दिन पश्चात् पैदावार देना आरम्भ कर देते है| इसकी फसल की तुड़ाई फ़रवरी से मार्च माह के मध्य की जाती है| जब इसके पौधों पर लगे फूल पीले और फलिया भूरे रंग की हो जाये उस दौरान पौधों की कटाई कर ले| मसूर की उन्नत किस्में प्रति हेक्टेयर के हिसाब से 20 से 25 क्विंटल का उत्पादन दे देती है, तथा 30 से 35 क्विंटल तक भूसा प्राप्त हो जाता है|

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