काबुली (डॉलर) चने की खेती कैसे करें

काबुली चना की खेती देशी चने की तरह ही की जाती है. काबुली चने को डॉलर और छोला चना भी कहा जाता है. काबुली चने का पौधा सामान्य (देशी) चने से बड़ा होता है. इसके पौधे पर फलियों (टाट) देरी से बनती है. इसके पौधे देशी चने से ज्यादा वक्त बाद पकते हैं. काबुली चनो का रंग हल्का सफ़ेद या हल्का गुलाबी पाया जाता है.

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काबुली की खेती

जिनका आकार सामान्य चने से काफी बड़ा पाया जाता हैं. काबुली चने का इस्तेमाल सब्जी के साथ साथ छोले और भूनकर खाने में ज्यादा किया जाता है. इसको खाने से कई तरह के रोगों में फायदा मिलता है. जिनमें पथरी, मोटापा और पेट संबंधित बिमारियों में यह लाभदायक होता है.

काबुली चने की खेती के लिए शरद जलवायु की जरूरत होती है. इसके पौधे अधिक तेज़ गर्मी के मौसम में अच्छे से विकास नही कर पाते. इसके पौधों को बारिश की सामान्य जरूरत होती है. काबुली चने की खेती के लिए सिंचाई की जरूरत होती है. इसकी खेती के लिए भूमि का पी. एच. मान सामान्य के आसपास होना चाहिए. काबुली चने का वर्तमान में उपयोग काफी बढ़ चुका है. काबुली चना किसानों के लिए काफी लाभ देने वाली खेती है. जिसको देखते हुए अब इसकी खेती बड़े पैमाने पर की जाने लगी है.

अगर आप भी काबुली चने के माध्यम से अच्छी कमाई करना चाहते हैं तो आज हम आपको इसकी खेती के बारें में सम्पूर्ण जानकारी देने वाले हैं.

उपयुक्त मिट्टी

काबुली चने की खेती सभी तरह की भूमि में की जा सकती है. लेकिन उन्नत पैदावार लेने के लिए इसे हल्की दोमट मिट्टी में उगाना चाहिए. इसकी खेती के लिए भूमि में जल भराव नही होना चाहिए. जलभराव होने से इसकी खेती में कई तरह के रोग लग जाते हैं. इसकी खेती के लिए भूमि का पी. एच. मान 7 के आसपास होना चाहिए.

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जलवायु और तापमान

काबुली चने की खेती के लिए शीतोष्ण जलवायु उपयुक्त होती है. इसके पौधे को विकास करने के लिए सर्दी के मौसम की जरूरत होती है. लेकिन सर्दियों में अधिक समय तक पड़ने वाला पाला इसकी फसल के लिए नुकसानदायक होता है. गर्मी का मौसम इसकी खेती के लिए उपयुक्त नही होता. गर्मी के मौसम में इसके पौधे विकास नही कर पाते हैं. और उन पर कई तरह के रोग लग जाते हैं. जिसका असर इसकी पैदावार पर देखने को मिलता है. इसकी खेती के लिए सामान्य बारिश की जरूरत होती है.

चने की खेती के लिए सामान्य तापमान की आवश्यकता होती है. शुरुआत में इसके पौधों को अंकुरित होने के लिए 20 डिग्री के आसपास तापमान की आवश्यकता होती है. उसके बाद इसके पौधे सर्दियों के मौसम में 10 डिग्री के आसपास तापमान पर भी आसानी से विकास कर लेते हैं. जबकि दानो के पकने के दौरान इसके पौधे को 25 से 30 डिग्री के बीच तापमान की जरूरत होती है.

उन्नत किस्में

काबुली चने की काफी उन्नत किस्में बाजार में उपलब्ध हैं. जिन्हें अलग अलग जगहों पर अधिक पैदावार लेने के लिए तैयार किया गया है.

श्वेता

काबुली चने की इस किस्म को जल्द पैदावार देने के लिए तैयार किया गया है. जिसे आई सी सी व्ही 2 के नाम से भी जानते हैं. इसके दाने मध्य मोटाई वाले आकर्षक दिखाई देते हैं. जो बीज रोपाई के लगभग 85 से 90 दिन बाद पककर तैयार हो जाते हैं. इस किस्म के पौधों का प्रति हेक्टेयर औसतन उत्पादन 15 से 20 क्विंटल के बीच पाया जाता है. काबुली चने की इस किस्म को सिंचित और असिंचित दोनों जगहों पर आसानी से उगाया जा सकता है. इसके दाने छोले के रूप में अधिक स्वादिष्ट होते हैं.

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मेक्सीकन बोल्ड

चने की ये एक विदेशी किस्म है, जिसके पौधे सामान्य ऊंचाई के पाए जाते हैं. इस किस्म के पौधों को असिंचित भूमि में अधिक पैदावार देने के लिए तैयार किया गया है. इसके पौधे रोपाई के लगभग 90 से 100 दिन बाद पककर तैयार हो जाते हैं. इसके दाने आकार में मोटे दिखाई देते हैं. जिनका रंग बोल्ड सफेद और चमकदार पाया जाता है. जो काफी आकर्षक दिखाई देते हैं. इसके दानो का बाजार भाव काफी अच्छा मिलता है. इसके पौधों का प्रति हेक्टेयर औसतन उत्पादन 25 से 35 क्विंटल के बीच पाया जाता है. लेकिन फसल की देखभाल अच्छे से की जाए तो पौधों का प्रति हेक्टेयर उत्पादन बढ़ाया जा सकता है. इसके पौधों पर कीट रोग का प्रभाव काफी कम देखने को मिलता है.

हरियाणा काबुली न. 1

चने की इस किस्म को मध्यम समय में अधिक पैदावार देने के लिए चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार द्वारा तैयार किया गया है. इस किस्म के पौधे रोपाई के लगभग 110 से 130 दिन बाद कटाई के लिए तैयार हो जाते हैं. जिनका प्रति हेक्टेयर औसतन उत्पादन 25 से 30 क्विंटल के बीच पाया जाता है. काबुली चने की इस किस्म को बारानी भूमि को छोड़कर लगभग सभी तरह की भूमि में उगा सकते हैं. इसके पौधे अधिक शखाओं युक्त फैले हुए होते हैं. इसके दानो का आकार सामान्य और रंग गुलाबी सफ़ेद होता है. इसके पौधों में उकठा रोग काफी कम देखने को मिलता है.

चमत्कार

काबुली चने की इस किस्म के पौधे सामान्य ऊंचाई और कम फैलने वाले होते हैं. इसके पौधों पर पत्तियां बड़े आकार वाली पाई जाती हैं. इसके पौधे रोपाई के लगभग 130 से 140 दिन बाद कटाई के लिए तैयार हो जाते हैं. इसके पौधों का प्रति हेक्टेयर औसतन उत्पादन 15 से 18 क्विंटल के बीच पाया जाता है. जिसके दानो का आकार बड़ा दिखाई देता है. इसके पौधों पर उकठा रोग देखने को नही मिलता.

काक 2

चना की ये एक मध्यम समय में पककर तैयार होने वाली किस्म हैं. इसके पौधे सामान्य ऊंचाई के पाए जाते हैं. जिन पर उकठा रोग देखने को नही मिलता. इसके पौधे रोपाई के लगभग 110 से 120 दिन बाद पककर तैयार हो जाते हैं. जिनका प्रति हेक्टेयर औसतन उत्पादन 15 से 20 क्विंटल के बीच पाया जाता है. इसके दाने सामान्य मोटाई और हल्के गुलाबी रंग के पाए जाते हैं.

एच. के. न. 2

काबुली चने की इस किस्म को चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार द्वारा तैयार किया गया है. इस किस्म के पौधे रोपाई के लगभग 120 दिन के आसपास पककर तैयार हो जाते हैं. जिनका प्रति हेक्टेयर औसतन उत्पादन 20 से 25 क्विंटल के बीच पाया जाता है. जिसे हरियाणा के आसपास के राज्यों में उगाया जाता है. इस किस्म के पौधे कम ऊंचाई और सीधे बढ़ने वाले होते हैं. जिसकी पत्तियों का रंग हल्का हरा दिखाई देता है.

जे.जी.के 1

काबुली चने की की इस किस्म को मध्य प्रदेश में अधिक उगाया जाता है. इस किस्म के पौधे रोपाई के लगभग 110 से 120 दिन के बीच पककर तैयार हो जाते हैं. जिनका प्रति हेक्टेयर औसतन उत्पादन 15 से 18 क्विंटल के बीच पाया जाता है. इसके दानो का रंग हल्का सफ़ेद या क्रमी सफेद पाया जाता है. इस किस्म के पौधे सामान्य लम्बाई के और कम फैलने वाले होते हैं. इसके पौधों पर पत्तियां बड़े आकार वाली और फूल सफ़ेद रंग के पाए जाते हैं.

जे.जी.के 2

काबुली चने की इस किस्म के पौधे कम समय में अधिक पैदावार देने के लिए जाने जाते हैं. इस किस्म के पौधे रोपाई के लगभग 100 से 110 दिन बाद कटाई के लिए तैयार हो जाते हैं. इसका इस्तेमाल छोले के रूप में भी किया जाता है. इस किस्म के पौधे कम फैलाव वाले पाए जाते हैं. जिसकी पतियों का आकार बड़ा और फूलों का रंग सफेद होता है. इसके दाने सामान्य आकार और हल्के सफेद रंग के पाए जाते हैं. जिनका प्रति हेक्टेयर औसतन उत्पादन 20 क्विंटल तक पाया जाता है.

एस आर 10

चने की इस किस्म को राजस्थान में अधिक उगाया जाता है. इस किस्म के पौधे सिंचित और असिंचित दोनों तरह की भूमि में उगाये जा सकते हैं. इस किस्म के पौधे असिंचित जगहों पर रोपाई के के दौरान लगभग 140 दिन के आसपास पककर तैयार होते हैं. जिनका प्रति हेक्टेयर औसतन उत्पादन 20 से 25 क्विंटल के बीच पाया जाता है. इस किस्म के पौधों पर कई तरह के रोग देखने को नही मिलते.

पूसा 1003

डॉलर चने की इस किस्म को उत्तर प्रदेश में अधिक उगाया जाता है. जिसके पौधे रोपाई के लगभग 130 से 140 दिन बाद खुदाई के लिए तैयार हो जाते हैं. जिनका प्रति हेक्टेयर औसतन उत्पादन 20 से 22 क्विंटल तक पाया जाता है. इसके दाने मध्यम बड़े आकार के पाए जाते है. इसके पौधे उकठा रोग के प्रति सहिष्णु होते हैं.

शुभ्रा

benefits of forming
मशहूर काबुली चने

चने की इस किस्म के पौधे सामान्य ऊंचाई के पाए जाते हैं. जिनको सिंचित और असिंचित दोनों तरह की भूमि में आसानी से उगाया जा सकता है. इस किस्म के पौधे सूखे के प्रति सहनशील पाए जाते हैं. इसके पौधे रोपाई के लगभग 120 से 125 दिन बाद कटाई के लिए तैयार हो जाते हैं. जिनका प्रति हेक्टेयर औसतन उत्पादन 20 क्विंटल के आसपास पाया जाता है. इस किस्म के पौधों पर उकठा रोग का प्रभाव देखने को नही मिलता.

इनके अलावा और भी काफी किस्में हैं जिन्हें अलग अलग जगहों पर वातावरण के हिसाब से अधिक उत्पादन लेने के लिए उगाया जाता है. जिनमें एच.के. 94-134, सी एस जे के 54, उज्जवल,अंजलि, गौरी, पंत काबुली 1, आसार, राज विजय काबुली 101, आनंद और जे.जी.के 3 जैसी बहुत साड़ी किस्में मौजूद हैं.

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खेत की तैयारी

काबुली चने की खेती के लिए मिट्टी का भुरभुरा होना जरूरी होता है. इसके लिए शुरुआत के खेत की गहरी जुताई कर उसे कुछ दिनों के लिए खुला छोड़ दें. जिससे मिट्टी में मौजूद हानिकारक कीट नष्ट हो जाते हैं. खेत को खाली छोड़ने के बाद उसमें लगभग 10 से 12 गाडी पुरानी गोबर की खाद को डालकर अच्छे से मिट्टी में मिला दें. खाद को मिट्टी में मिलाने के लिए खेत की कल्टीवेटर के माध्यम से दो तिरछी जुताई कर दें.

खाद को मिट्टी में मिलाने के बाद खेत में रोटावेटर चलाकर मिट्टी में मौजूद ढेलों को नष्ट कर खेत में पाटा लगाकर खेत को समतल बना दे. उसके बाद बारिश होने के तुरंत बाद इसके दानों की रोपाई कर दें. लेकिन जिन किसान भाई के पास सिंचाई उचित व्यवस्था हो वो खेत का पलेव कर और फिर से खेत की मिट्टी को भुरभुरा कर बीज की रोपाई टाइम से कर सकता है.

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बीज की मात्रा और उपचार

डॉलर चने की प्रति एकड़ रोपाई के लिए लगभग 35 से 40 किलो बीज की जरूरत होती हैं. इसके बीजों की खेत में रोपाई से पहले उन्हें कार्बेन्डाजिम, मैंकोजेब या राइजोबियम कल्चर से उपचारित कर लेना चाहिए. इससे दानो के अंकुरण के वक्त लगने वाले रोगों का प्रभाव काफी कम देखने को मिलता है.

बीज रोपाई का तरीका और टाइम

काबुली चने  के बीजों की रोपाई मशीनों के माध्यम से की जाती है. मशीन के माध्यम से रोपाई के दौरान इसके बीजों को पंक्तियों में उगाया जाता है. पंक्तियों में बीजो की रोपाई के दौरान प्रत्येक पंक्तियों के बीच एक फिट की दूरी होनी चाहिए. और पंक्तियों में उगाये गए बीजों के बीच 20 से 25 सेंटीमीटर की दूरी होनी चाहिए. काबुली चने के बीजों की रोपाई के दौरान उन्हें 5 से 7 सेंटीमीटर की गहराई में उगाना चाहिए. ताकि बीजों का अंकुरण अच्छे से हो पाए.

काबुली चने की खेती रबी की फसलों के साथ की जाती है. लेकिन सिंचित और असिंचित जगहों के आधार पर इनकी रोपाई अलग अलग समय पर की जाती हैं.  सिंचित जगहों पर रोपाई के दौरान इसके बीजों की रोपाई अक्टूबर माह के आखिर तक कर देनी चाहिए. और असिंचित जगहों पर इसकी रोपाई बारिश के आधार पर की जाती है.

पौधों की सिंचाई

डॉलर चने के पौधों को देशी चने से ज्यादा पानी की जरूरत होती है. इसलिए इसके पौधों की रोपाई के लगभग 50 दिन के आसपास पौधों की पहली सिंचाई कर देनी चाहिए. उसके बाद इसके पौधों की दूसरी सिंचाई फलियों में दाने बनने के दौरान करनी चाहिए. और इस दौरान अगर बारिश हो जाए तो पौधों की दूसरी सिंचाई नही करनी चाहिए. चने के पौधों में फूल बनने के दौरान कभी भी सिंचाई नही करनी चाहिए. इससे फसल खराब हो जाती है. इसके पौधों की दो सिंचाई काफी होती है. लेकिन पानी की उचित व्यवस्था हो तो दानो के पकने के दौरान एक हल्की सिंचाई करने से दाने अच्छे से पकते हैं. और पैदावार भी अधिक प्राप्त होती हैं.

उर्वरक की मात्रा

चने के पौधों को उर्वरक की ज्यादा जरूरत नही होती. इसके पौधे खुद भूमि में नाइट्रोजन की आपूर्ति करते हैं. जिससे भूमि की उर्वरक क्षमता बढती है. इसकी खेती के लिए शुरुआत में खेत की जुताई के वक्त दी जाने वाली 10 से 12 गाडी गोबर की खाद काफी होती हैं. और जो किसान भाई रासायनिक खाद का इस्तेमाल करना चाहता है वो इसकी इसके बीजों की रोपाई से पहले 50 किलो डी.ए.पी. की मात्रा को खेत की आखिरी जुताई के वक्त खेत में छिडक दें.

खरपतवार नियंत्रण

चने की खेती में कई तरह की खरपतवार जन्म लेती हैं. जो जमीन के अंदर पाए जाने वाले पोषक तत्वों को ग्रहण कर पौधों के विकास को रोक देती हैं. जिसका असर पैदावार पर देखने को मिलता है. जिनका समय रहते इनका नियंत्रण करना जरूरी होता है. काबुली चने की खेती में खरपतवार नियंत्रण रासायनिक और प्राकृतिक दोनों तरीकों से किया जाता है.

रासायनिक तरीके से खरपतवार नियंत्रण करने के लिए बीज रोपाई के तुरंत बाद खेत में पेन्डीमेथालीन की उचित मात्रा का छिडकाव कर देना चाहिए. इसके अलावा प्राकृतिक तरीके से खरपतवार नियंत्रण करने के लिए पौधों की नीलाई गुड़ाई कर उनमें खरपतवार नियंत्रण किया जाता है. इसके पौधों की पहली गुड़ाई बीज अंकुरित होने के लगभग 25 से 30 दिन बाद कर देनी चाहिए. उसके बाद दूसरी गुड़ाई पहली गुड़ाई के लगभग 20 दिन बाद करनी चाहिए. इसके पौधों में खरपतवार नियंत्रण के लिए दो गुड़ाई काफी होती है.

Purpose of forming
काबुली चने के पौधे

पौधों में लगने वाले रोग और उनकी रोकथाम

काबुली चने के पौधों में कई तरह के रोग देखने को मिलते हैं. जिनकी रोकथाम समय रहते ना की जाये तो पौधों की पैदावार और उनके विकास पर प्रभाव देखने को मिलता हैं.

उकठा रोग

इसके पौधों में उकठा रोग फफूंद की वजह से फैलता है. पौधों पर इस रोग का प्रभाव बीज रोपाई के लगभग तीन से चार सप्ताह बाद ही दिखाई देने लगता है. इस रोग के लगने पर पौधे की पत्तियों का रंग हल्का पीला दिखाई देने लगता है. रोग बढ़ने पर पत्तियां सुखकर गीरने लगती है. जिस कारण पौधे का विकास रुक जाता है. जिसके कुछ दिन बाद सम्पूर्ण पौधा नष्ट हो जाता है. इस रोग की रोकथाम के लिए शुरुआत में बीजों को कार्बेन्डाजिम या बाविस्टीन की उचित मात्रा से उपचारित कर लेना चाहिए. इसके अलावा खड़ी फसल में रोग दिखाई देने पर पौधों पर कार्बेन्डाजिम की उचित मात्रा का छिडकाव करना चाहिए.

हरदा रोग

चने के पौधों में यह रोग यूरोमाईसीज साइसरीज नामक फफूंद की वजह से फैलता है. पौधों पर इस रोग का प्रभाव मौसम में अधिक नमी के बने रहने और पाला के पड़ने के दौरान दिखाई देता है. इस रोग के लगने से पौधे के तने और शाखाओं पर सफेद रंग के फफोले बन जाते हैं. रोग बढ़ने पर इन फफोलों का रंग काला दिखाई देने लगता है. और कुछ दिन बाद पौधे पूरी तरह सूखकर नष्ट हो जाते हैं. इस रोग की रोकथाम के लिए पौधों पर रोग दिखाई देने के तुरंत बाद मैंकोजेब की उचित मात्रा को पानी में मिलाकर 10 दिन के अंतराल में दो बार छिडक दें.

रस्ट

चने के पौधों में इस रोग का प्रभाव फसल के पकने के दौरान दिखाई देता है. जो सूक्ष्म जीवों के संक्रमण के कारण फैलता हैं. इस रोग के लगने पर शुरुआत में पौधे की पत्तियों और शाखाओं पर भूरे काले रंग के चित्ते दिखाई देने लगते हैं. रोग के बढ़ने से इन धब्बों का आकार बढ़ जाता है. जिससे पौधों की पैदावार प्रभावित होती है. इस रोग की रोकथाम के लिए पौधों पर मैंकोजेब, गंधक या कॉपर ऑक्सीक्लोराइड उचित मात्रा का छिडकाव 10 दिन के अंतराल में 2 से तीन बार करना चाहिए.

कटुआ कीट

चने के पौधों में कटुआ कीट रोग का प्रभाव पौधों के विकास के दौरान देखने को मिलता है. इस रोग की सुंडी पौधे की जड़ के पास से काटकर पौधों को नष्ट कर देती हैं. जिससे पौधा तुरंत खराब हो जाता है. इसकी सुंडी पौधों को रात के मौसम में काटती है. और दिन के मौसम में मिट्टी में छुप जाती है. रोग के बढ़ने पर सम्पूर्ण फसल खराब हो जाती है. इस रोग की रोकथाम के लिए क्लोरोपाइरीफास की ढाई लीटर मात्रा को पानी में मिलाकर खेत की जुताई के वक्त खेत में छिडक देना चाहिए. इसके अलावा फोरेट का इस्तेमाल भी करना अच्छा होता है.

फली छेदक

डॉलर चने के पौधों मे फली छेदक रोग कीट वजह से फैलता है. इस रोग के कीट की सुंडी का रंग हल्का हरा दिखाई देता है. जो पौधों पर फली बनने के दौरान दिखाई देती है. इसकी सुंडी पौधे की फलियों में छेद कर अंदर चली जाती हैं. और फलियों में पाए जाने वाले दानो को खाकर उन्हें खराब कर देती है. रोग बढ़ने से इसका असर ज्यादातर पौधों पर देखने को मिलता हैं. जिससे पौधों से प्राप्त होने वाली पैदावार को सबसे ज्यादा नुक्सान पहुँचाता है. इस रोग की रोकथाम के लिए पौधों पर स्पाइनोसेड या इन्डोक्साकार्ब की उचित मात्रा का 2 बार छिडकाव करना चाहिए. इसके अलावा रोग दिखाई देने पर नीम के तेल का छिडकाव पौधों पर दस दिन के अंतराल में दो बार करना चाहिए.

फसल की कटाई और मढ़ाई

इसके पौधे बीज रोपाई के लगभग 100 से 120 दिन बाद कटाई के लिए तैयार हो जाते हैं. पकने के बाद इसके पौधों का रंग हल्का पीला दिखाई देने लगता है. और फलियों में पाया जाने वाला दाना कठोर हो जाता है. जिसमें नमी की मात्रा पाई जाती है. इस दौरान इसके पौधों की जड़ के पास से कटाई कर लेनी चाहिए.पौधों की कटाई करने के बाद उन्हें खेत में एकत्रित कर कुछ दिन तक तेज धूप में सूखा लेना चाहिए.

जब फसल अच्छी तरह सूख जाए तब उसे थ्रेसर की सहायता से निकलवा लेना चाहिए. जबकि छोटे किसान भाई इसकी फसल को सूखने के बाद लकड़ी से पीटकर भी निकालते हैं. उसके बाद प्राप्त होने वाली उपज को बोरो में भरकर बाजार में बेचने के लिए भेज देना चाहिए. लेकिन अगर बाजार में फसल का दाम उचित नाम मिले तो किसान भाई इसे कुछ समय के लिए भंडारित कर अच्छे दाम मिलने पर बेच सकता है.

पैदावार और लाभ

काबुली चने के दाने सामान्य चने से मोटे पाए जाते हैं. जिसकी विभिन्न किस्मों का प्रति हेक्टेयर औसतन उत्पादन 20 क्विंटल से ज्यादा पाया जाता है. और इसका बाजार भाव 6 हजार प्रति क्विंटल के आसपास पाया जाता है. इस हिसाब से किसान भाई एक बार में एक हेक्टेयर से सालाना सवा लाख के आसपास कमाई कर सकता है.

काबुली चने की खेती कैसे करें?

काबुली चने की खेती के लिए उचित जल निकास वाली बलुई दोमट से लेकर दोमट तथा मटियार मिट्टी सर्वोत्तम रहती है। मृदा का पी-एच मान 6-7.5 उपयुक्त रहता है। चने की फसल के लिए अधिक उपजाऊ भूमियाँ उपयुक्त नहीं होती,क्योंकि उनमें पौधों की वानस्पतिक बढ़वार अधिक होती है जिससे फूल एवं फलियाँ कम बनती हैं।

काबुली चना की खेती कहाँ होती है?

चने के अंतर्गत कुल क्षेत्रफल के 85 प्रतिशत हिस्से में देशी चना तथा 15 प्रतिशत भाग में काबुली चने की खेती होती है। काबुली चने की खेती मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश आदि राज्यों में की जाती है।

चने की अच्छी पैदावार के लिए क्या करें?

भूमि की तैयारी

चने की खेती हल्की से भारी भूमि में भी की जाती है, किन्तु अधिक जलधारण एवं उचित जलनिकास वाली भूमि सर्वोत्तम रहती है। मृदा का पी-एच मान 6-7.5 उपयुक्त रहता है। असिंचित अवस्था में मानसून शुरू होने के पूर्व गहरी जुताई करने से रबी के लिए भी नमी संरक्षण होता है।

चना में कौन सी दवा डालना चाहिए?

कृषि विभाग के अधिकारियों ने बताया कि चने में इल्ली लगने पर किसानों को क्यूनॉलफास 25 ईसी 1000 से 1250 मिली प्रति हैक्टेयर की दर से छिड़काव करें। क्लोरोपायरीफॉस 20 ईसी 1250 से 1500 मिली प्रति हैक्टेयर की दर से छिड़काव करें।

चना के लिए कौन सा उर्वरक सबसे अच्छा है?

सभी उर्वरकों को 2 सेमी की गहराई पर और बीज से 5 सेमी के किनारे पर खांचे में ड्रिल किया जाए तो बेहतर है। छोले के लिए आम तौर पर अनुशंसित खुराक में प्रति हेक्टेयर 15-20 किलोग्राम नाइट्रोजन (एन) और 50-60 किलोग्राम फास्फोरस (पी) शामिल हैं।

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